बेनीपुर अनुमंडल मुख्यालय से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में अवस्थित है नवादा गांव के दुर्गा मंदिर। यहां हैयहट्ट देवी के सिंहासन की पूजा होती है। वैसे तो इस मंदिर में प्रत्येक दिन पूजा-अर्चना करने दूरदराज से लोग पहुंचते हैं। खासकर प्रत्येक रविवार और मंगलवार के दिन मेला जैसा नजारा दिखता है। यहां साल के चारों नवरात्रों में मां दुर्गा की विशेष पूजा होती है,लेकिन शारदीय नवरात्रा का यहां विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रा के अवसर पर पड़ोसी देश नेपाल के भक्त भी मां दुर्गा के दर्शन को आते हैं। सालों भर यहां लोग ब्राह्मण और कुमारी कन्याओं को भोजन भी करवाते हैं। शारदीय नवरात्रा के अवसर पर अभी तक कई साधक कलशस्थापन से नवमी तक बिना जल ग्रहण किये अपनी छाती पर कलश स्थापना करते हैं। यहां नवरात्रा में छागर बलिप्रदान की भी प्रथा है। 52 सिद्धपीठ में से एक है नवादा दुर्गा मंदिर सिंहासन की पूजा के संबंध में लोगों का अपना अलग अलग मंतव्य है।
शिव प्रिय सती का वाम स्कन्ध इसी जगह पर गिरा था
गांव के ही ग्रामीण का कहना है कि शिव प्रिय सती का वाम स्कन्ध इसी जगह गिरा है। जहां आज दुर्गा का भव्य मंदिर में सिंहासन का विद्यमान रूप कान के समान आकार का है। नवादा दुर्गा स्थान कुल 52 सिद्ध पीठ में से एक है। इस पीठ का वर्णन देवी भागवत पुराण, मत्स्य पुराण में भी है। जिसके अनुसार सती का वाम स्कन्ध इसी जगह पर गिरा है। माता को लेकर प्रचलित है यह कहानी अधिकांश लोगों का कहना है कि सैंकड़ो वर्ष पहले राजा हयहट्ट द्वारा मां जगदम्बा की मूर्ति स्थापित की गई थी। जिसे बहेड़ी प्रखंड के हावीडीह गांव के एक साधक प्रतिदिन कमला नदी पार कर मां भगवती की पूजा अर्चना करने नवादा जाते थे। एक दिन उक्त साधक बीमार पर गए। फिर भी उन्होंनें नवादा आकर भगवती की पूजा अर्चना की। पूजा के बाद साधक ने भगवती से याचना की कि बीमार होने के कारण अब मैं पूजा अर्चना करने नहीं आ पाऊंगा। इसलिए हे माता आप ही इसका कोई उपाय कीजिए।
साधक को माता ने दिया था स्वप्न
यह कह कर उक्त साधक मंदिर के मुख्यद्वार के समीप बीमार हाल में सो गया। जिसके बाद भगवती ने उक्त साधक को सुप्तावस्था में स्वप्न दिया कि तुम मेरी प्रतिमा को यहां से साथ लेकर चलो। जिसके बाद साधक ने भगवती की प्रतिमा लेकर हावीडीह गांव आ गए। गांव में प्रतिमा स्थापित की गई। आज भी वहां भगवती मंदिर है। इधर नवादा गांव के ग्रामीणों को जब पता चला कि मां भगवती की प्रतिमा को मंदिर से हावीडीहगांव के एक साधक अपने गांव लेकर चले गए, तो वहां के ग्रामीणों ने हावीडीहगांव से प्रतिमा को वापस लाने का फैसला कर लिया ।लेकिन मां भगवती ने मंदिर के पुजारी को स्वप्न दिया कि ग्रामीण हमारे सिंहासन की ही पूजा करें। उसी में ही गांव का कल्याण होगा और मनोकामना पूर्ण होगी ।जिसके बाद ग्रामीणों ने उसी दिन से मां भगवती के सिंहासन की पूजा अर्चना करने लगे जो अनवरत जारी है।
श्रद्धालुओं को मिलता है मनोवांछित फल
मंदिर के पुजारी का कहने है कि जो लोग सच्चे मन से मां भगवती की पूजा अर्चना करते हैं, उनको मनोवांछित फल मिलते हैं। मां जगदम्बा धाम नवादा पहुंचने का मार्ग मां जगदम्बा धाम नवादा आने के लिए सड़क मार्ग से भी आ सकते हैं। जिसके लिये मझौड़ा चौक से बहेड़ा-झंझारपुर पथ से पहुंच सकते हैं। वैसे मां जगदम्बा के नाम पर एक श्रमदान से हाल्ट निर्माण तो करवाया है। लेकिन वर्तमान में अभी वहां गाड़ी का ठहराव नहीं हो रहा है। अगर उक्त हाल्ट पर गाड़ी ठहराव विभाग द्वारा शुरू कर दिया जाता है। तो श्रद्धालुओं को जगदम्बा धाम जाने के लिए सबसे सुगम साधन होगा और श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ सकता है।
शिव प्रिय सती का वाम स्कन्ध इसी जगह पर गिरा था
गांव के ही ग्रामीण का कहना है कि शिव प्रिय सती का वाम स्कन्ध इसी जगह गिरा है। जहां आज दुर्गा का भव्य मंदिर में सिंहासन का विद्यमान रूप कान के समान आकार का है। नवादा दुर्गा स्थान कुल 52 सिद्ध पीठ में से एक है। इस पीठ का वर्णन देवी भागवत पुराण, मत्स्य पुराण में भी है। जिसके अनुसार सती का वाम स्कन्ध इसी जगह पर गिरा है। माता को लेकर प्रचलित है यह कहानी अधिकांश लोगों का कहना है कि सैंकड़ो वर्ष पहले राजा हयहट्ट द्वारा मां जगदम्बा की मूर्ति स्थापित की गई थी। जिसे बहेड़ी प्रखंड के हावीडीह गांव के एक साधक प्रतिदिन कमला नदी पार कर मां भगवती की पूजा अर्चना करने नवादा जाते थे। एक दिन उक्त साधक बीमार पर गए। फिर भी उन्होंनें नवादा आकर भगवती की पूजा अर्चना की। पूजा के बाद साधक ने भगवती से याचना की कि बीमार होने के कारण अब मैं पूजा अर्चना करने नहीं आ पाऊंगा। इसलिए हे माता आप ही इसका कोई उपाय कीजिए।
साधक को माता ने दिया था स्वप्न
यह कह कर उक्त साधक मंदिर के मुख्यद्वार के समीप बीमार हाल में सो गया। जिसके बाद भगवती ने उक्त साधक को सुप्तावस्था में स्वप्न दिया कि तुम मेरी प्रतिमा को यहां से साथ लेकर चलो। जिसके बाद साधक ने भगवती की प्रतिमा लेकर हावीडीह गांव आ गए। गांव में प्रतिमा स्थापित की गई। आज भी वहां भगवती मंदिर है। इधर नवादा गांव के ग्रामीणों को जब पता चला कि मां भगवती की प्रतिमा को मंदिर से हावीडीहगांव के एक साधक अपने गांव लेकर चले गए, तो वहां के ग्रामीणों ने हावीडीहगांव से प्रतिमा को वापस लाने का फैसला कर लिया ।लेकिन मां भगवती ने मंदिर के पुजारी को स्वप्न दिया कि ग्रामीण हमारे सिंहासन की ही पूजा करें। उसी में ही गांव का कल्याण होगा और मनोकामना पूर्ण होगी ।जिसके बाद ग्रामीणों ने उसी दिन से मां भगवती के सिंहासन की पूजा अर्चना करने लगे जो अनवरत जारी है।
श्रद्धालुओं को मिलता है मनोवांछित फल
मंदिर के पुजारी का कहने है कि जो लोग सच्चे मन से मां भगवती की पूजा अर्चना करते हैं, उनको मनोवांछित फल मिलते हैं। मां जगदम्बा धाम नवादा पहुंचने का मार्ग मां जगदम्बा धाम नवादा आने के लिए सड़क मार्ग से भी आ सकते हैं। जिसके लिये मझौड़ा चौक से बहेड़ा-झंझारपुर पथ से पहुंच सकते हैं। वैसे मां जगदम्बा के नाम पर एक श्रमदान से हाल्ट निर्माण तो करवाया है। लेकिन वर्तमान में अभी वहां गाड़ी का ठहराव नहीं हो रहा है। अगर उक्त हाल्ट पर गाड़ी ठहराव विभाग द्वारा शुरू कर दिया जाता है। तो श्रद्धालुओं को जगदम्बा धाम जाने के लिए सबसे सुगम साधन होगा और श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ सकता है।




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