Thursday, June 4, 2020

उग्रतारा स्थान,महिषी(सहरसा)

देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में महिषी के उग्रतारा स्थान का विशेष  महत्व है। कोसी प्रमंडलीय मुख्यालय से 18 किमी पश्चिम धर्ममूला नदी के तट पर अवस्थित प्राचीन माहिष्मती अब महिषी गांव में वर्तमान मंदिर का निर्माण 16 वीं शताब्दी में दरभंगा राज परिवार से जुड़ी महारानी पद्मावती ने कराया था।
प्राचीन मान्यता के अनुसार कठिन साधना कर महर्षि वशिष्ठ द्वारा भगवती को प्रसन्न कर उन्हें सदेह यहां लाया गया था। कालांतर में शर्त भंग होने पर भगवती तारा पाषाण रूप में परिवर्तित हो गई। जिस कारण इन्हें वशिष्ठ अराधिता उग्रतारा भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार सती की बांयी आंख यहां गिरी थी। इसलिए यहां की सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में मान्यता है। महिषी में उग्रतारा की प्रतिमा कई स्वरुपों में देखने को मिलती है। भक्त बताते हैं कि प्रतिमा सुबह में अलसायी, दोपहर में रौद्र तथा शाम में सौम्य स्वरुप में दिखती है। माता का इस तीनो रुप का दर्शन भक्तों के लिए सुखद और फलदायी होता है। 
दूर-दूर तक फैली है ख्याति
उग्रतारा स्थान की ख्याति देश ही नहीं विदेशों में भी फैली है। यहां आसपास के इलाके व देश के अन्य राज्यों सहित नेपाल के भी श्रद्धालु पूजा करने आते हैं। यूं तो यहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है।

नवरात्र में होती तंत्र साधना
उग्रतारा मंदिर में नवरात्रा के मौके पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटती है। नवरात्रा में देश के अन्य हिस्सों से आकर तांत्रिक यहां तंत्र साधना करते हैं। नवरात्रा की नवमी तिथि को यहां दर्जनों भैसों सहित सैकड़ों बकड़े की बलि दी जाती है।  शारदीय नवरात्रा में बिहार सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा यहां भव्य उग्रतारा महोत्सव का प्रत्येक वर्ष आयोजन किया जाता है। महोत्सव में देश के ख्याति प्राप्त कलाकार यहां आकर श्रोताओं का मनोरंजन करते हैं।

Tuesday, June 2, 2020

श्यामा माई मंदिर , दरभंगा

 बिहार के दरभंगा जिले में काली रूप में मां श्यामा बड़े ही भव्य रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं. इस  मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह मंदिर ने केवल चिता पर बना है,  बल्कि मंदिर के अंदर हर  तरह के मागंलिक कार्य भी किए जाते हैं.
बिहार के दरभंगा जिले में मां काली का यह भव्य मंदिर मौजूद है, जिन्हें यहां भक्त श्यामा माई के नाम से पुकारते हैं. इस मंदिर के निर्माण की कहानी जिसे सुनकर सब हैरान हो जाते हैं. मां काली का यह  मंदिर दरभंगा राज परिवार के महान साधक महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर बना है. इस मंदिर के अंदर दक्षिण दिशा की ओर एक खास स्थान पर आज भी लोग साधक महाराज रामेश्वर सिंह के चिता की तपिस को महसूस करते हैं, फिर चाहे कड़ाके की ठंड ही क्यों न पड़ रही हो.
यहां के लोगों का मानना है कि पूरे भारत में काली की इतनी बड़ी मूर्ति कहीं नहीं है. मूर्ति का विग्रह   अलौकिक और अविस्मरणीय है. भक्तों को मां श्यामा के दर्शन से ही अदभुत सुख की  प्राप्ति होती है. कहते है अगर भक्त नम आंखो से कुछ मांगते हैं तो उनकी इच्छा अवश्य पूरी होती है. इस विशालकाय मंदिर की स्थापना 1933 में दरभंगा महाराजा कामेश्वर सिंह ने की थी, जिसमें मां श्यामा की विशाल   मूर्ति भगवन शिव की जांघ एवं वक्षस्थल पर अवस्थित है. मां काली की दाहिनी तरफ   महाकाल और बायीं ओर भगवान गणेश और बटुक की प्रतिमाएं स्थापित हैं. चार हाथों से  सुशोभित मां काली की इस भव्य प्रतिमा में मां के बायीं ओर के एक हाथ में खड्ग, दूसरे में मुंड तो वहीं दाहिनी ओर के दोनों हाथों से  अपने पुत्रों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में   विराजमान हैं.
मां श्यामा के दरबार में होने वाली आरती का विशेष महत्व है. माना जाता है कि जो भी मां की इस   आरती का गवाह बन गया उसके जीवन के सारे अंधकार दूर हो जाते हैं, साथ ही भक्तों की समस्त   मनोकामना भी पूरी हो जाती है. मंदिर के गर्भगृह में जहां एक तरफ काली रूप में मां श्यामा के भव्य दर्शन होते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रार्थना स्थल के मंडप में सूर्य, चंद्रमा ग्रह,  नक्षत्रों सहित कई तान्त्रिक यंत्रमंदिर की दीवारों पर देखने को मिलते हैं. इसकी सबसे   बड़ी वजह यह है कि इस मंदिर में मां श्यामा  की पूजा तांत्रिक और वैदिक दोनों ही रूपों में की जाती है.
आमतौर पर हिन्दू रीती रिवाज के अनुसार यह परंपरा रही है की किसी भी व्यक्ति का  कोइ भी   मांगलिक संस्कार होने के एक साल तक वह श्‍मशान नहीं जाता है, लेकिन मां श्यामा के इस मंदिर में नए जोड़े मां का आशीर्वाद ही लेने नहीं बल्कि श्मसान भूमि पर बने इस   मंदिर में अनेकों शादियां भी   होती है.