Sunday, May 31, 2020

उगना महादेव , भवानीपुर (मधुबनी)

आज हम आपको उस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं कि जो बिहार के मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में स्थित है। भगवान शिव का यह मंदिर उगना महादेव व उग्रनाथ मंदिर के नाम से मशहूर है। ऐसा कहा जाता है कि इसी मंदिर में भगवान शिव ने स्वयं मैथिली भाषा के महाकवि विद्यापति के घर चाकरी की थी।
सबसे पहले हम आपको महाकवि विद्यापति का परिचय देते हैं। हिंदी साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख कवियों में से एक हैं विद्यापति। एक अच्छे कवि होने के साथ-साथ विद्यापति भोलेनाथ के बहुत बड़े भक्त भी थे। भगवान शिव के प्रति यह उनका प्रेम ही था जिस वजह से उन्होंने शिव जी पर कई गीतों की रचना की।
मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव उनकी भक्ति से इस कदर प्रसन्न हुए कि वह रूप बदलकर उनके पास आ गए। यहां तक कि उनके साथ रहने के लिए शिव जी उनके नौकर तक बन गए थे। उनके घर पर काम करने के लिए शिव जी ने अपना नाम उगना बताया था। हालांकि विद्यापति ने उन्हें काम देने से इंकार कर दिया क्योंकि आर्थिक दृष्टि से वह सबल नहीं थे। इस पर शिव जी ने कहा कि उन्हें पैसा नहीं देना पड़ेगा बल्कि दो वक्त भोजन देने से ही चलेगा। आखिरकार कवि विद्यापति उन्हें घर पर रखने के लिए तैयार हो गए।
कहते हैं कि एक दिन विद्यापति राजा के दरबार में जा रहे थे। तेज गर्मी और चिलचिलाती धूप में उनका गला सूखने लगा। उनके साथ उस वक्त उगना (शिवजी) भी थे। विद्यापति ने उगना से पानी लाने के लिए कहा। आदेश पाकर शिव जी कुछ दूरी पर गए और अपनी जटा खोलकर एक लौटा गंगाजल भरकर लाए।
विद्यापति ने जैसे ही पानी पीया उन्हें पता लग गया कि यह गंगाजल है। इस पर वह काफी सोचते रहे कि आखिर यहां वन में गंगाजल कहां से मिला! कुछ देर बाद उन्हें संदेह हुआ कि कहीं उगना भगवान शिव तो नहीं हैं। यह विचार आते ही वह उगना के चरण पकड़ लिए। इसके बाद महादेव को अपने असली रूप में आना पड़ा। शिवजी ने उनसे कहा कि वह उनके साथ ही उगना बनकर रहना चाहते हैं, लेकिन किसी को यह सच्चाई पता नहीं लगनी चाहिए।
विद्यापति ने भी उनकी बात मान ली। इधर एक दिन उगना से एक गलती हो गई जिस पर विद्यापति की पत्नी उगना को चूल्हे की जलती हुई लकड़ी से पीटने लगी। विद्यापति यह देखकर दंग रह गए और उनके मुंह से निकल गया कि यह महादेव हैं और तुम इन्हें ही मार रही हो। विद्यापति ने जैसे ही यह कहा उसी वक्त भगवान शिव अंर्तध्यान हो गए।
 विद्यापति को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह शिव जी को ढूंढ़ने के लिए वन में निकल पड़े। भक्त को हैरान-परेशान देख भोलेनाथ उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें समझाया कि वह अब उनके साथ नहीं रह सकते, लेकिन अब एक शिवलिंग के रूप में वह हमेशा उनके पास रहेंगे। उसके बाद से ही वहां स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हो गया।
उगना महादेव मंदिर के गर्भगृह में छह सीढ़ियां उतरकर जाना पड़ता है। यहां माघ कृष्ण पक्ष में नर्क निवारण चतुर्दशी के पर्व को काफी धूमधाम से मनाया जाता है। इस वक्त जिस मंदिर को भक्त देखते हैं उसका निर्माण साल 1932 में किया गया है। हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि साल 1934 में आए भूकंप से भी मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।
 




मंदिर के सामने एक सरोवर और एक कुआं भी है। इस कुएं के बारे में लोग कहते हैं कि यही वह जगह है जहां से शिव जी ने जटा खोलकर गंगाजल निकाला था। यहां आने वाले श्रदलु इस पानी को जरूर पीते हैं।

कल्याणेश्वर शिवालय, हरलाखी (मधुबनी )

                       
हरलाखी प्रखंड के कलना गांव में स्थित है अति प्राचीन कल्याणेश्वर शिवालय। कल्याणेश्वर शिव श्रद्धालुओं को मनोवांछित फल देते हैं। मंदिर की बनावट गुंबददार है। शिवालय परिसर में अन्य देवों की प्रतिमाएं भी विभिन्न मंदिरों में स्थापित हैं। शिवालय स्थित तालाब भी हैं।

कल्याणेश्वर शिवलिग खुरदुरा व अधिक व्यास वाला है। इसका आधार छह फुट नीचे है। इसकी प्राचीनता का अंदाज इससे लगा सकते हैं कि यहां राजा जनक द्वारा पूजा करने का प्रमाण पुराणों में है। प्रतिवर्ष यहीं से जनकपुर की अतिप्रसिद्ध परिक्रमा सदियों से शुरू होती आई हैं। मंदिर की भव्य बनावट लोगों को आकर्षित करती है।

कल्याणेश्वर शिवालय लगभग 200 वर्ष प्राचीन होने का प्रमाण मिलता है। शिवालय मुख्य तल से गर्भ गृह दस फीट नीचे है। तैयारियां सावन में जयनगर के कमला नदी से कांवर में जल भरकर लाखों की संख्या में कांवरिया कल्याणेश्वर शिवालय आते हैं। प्रत्येक सोमवार को यहां कांवरियों की भारी भीड़ होती है। शिवालय में स्थानीय स्तर पर लोगों द्वारा कांवरियों की सुविधा की व्यवस्था की जाती है। सावन में यहां विभिन्न प्रकार की दुकानें सज जाती हैं। सावन में शिवालय की आकर्षक ढ़ंग से सजावट की जाती है। शिव आराधना से सकल मनोरथ की प्राप्ति होती है।

Saturday, May 30, 2020

नवादा दुर्गा मंदिर, बेनीपुर (दरभंगा)

बेनीपुर अनुमंडल मुख्यालय से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में अवस्थित है नवादा गांव के दुर्गा मंदिर। यहां हैयहट्ट देवी के सिंहासन की पूजा होती है। वैसे तो इस मंदिर में प्रत्येक दिन पूजा-अर्चना करने दूरदराज से लोग पहुंचते हैं। खासकर प्रत्येक रविवार और मंगलवार के दिन मेला जैसा नजारा दिखता है। यहां साल के चारों नवरात्रों में मां दुर्गा की विशेष पूजा होती है,लेकिन शारदीय नवरात्रा का यहां विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रा के अवसर पर पड़ोसी देश नेपाल के भक्त भी मां दुर्गा के दर्शन को आते हैं। सालों भर यहां लोग ब्राह्मण और कुमारी कन्याओं को भोजन भी करवाते हैं। शारदीय नवरात्रा के अवसर पर अभी तक कई साधक कलशस्थापन से नवमी तक बिना जल ग्रहण किये अपनी छाती पर कलश स्थापना करते हैं। यहां नवरात्रा में छागर बलिप्रदान की भी प्रथा है। 52 सिद्धपीठ में से एक है नवादा दुर्गा मंदिर सिंहासन की पूजा के संबंध में लोगों का अपना अलग अलग मंतव्य है।
शिव प्रिय सती का वाम स्कन्ध इसी जगह पर गिरा था

गांव के ही ग्रामीण का कहना है कि शिव प्रिय सती का वाम स्कन्ध इसी जगह गिरा है। जहां आज दुर्गा का भव्य मंदिर में सिंहासन का विद्यमान रूप कान के समान आकार का है। नवादा दुर्गा स्थान कुल 52 सिद्ध पीठ में से एक है। इस पीठ का वर्णन देवी भागवत पुराण, मत्स्य पुराण में भी है। जिसके अनुसार सती का वाम स्कन्ध इसी जगह पर गिरा है। माता को लेकर प्रचलित है यह कहानी अधिकांश लोगों का कहना है कि सैंकड़ो वर्ष पहले राजा हयहट्ट द्वारा मां जगदम्बा की मूर्ति स्थापित की गई थी। जिसे बहेड़ी प्रखंड के हावीडीह गांव के एक साधक प्रतिदिन कमला नदी पार कर मां भगवती की पूजा अर्चना करने नवादा जाते थे। एक दिन उक्त साधक बीमार पर गए। फिर भी उन्होंनें नवादा आकर भगवती की पूजा अर्चना की। पूजा के बाद साधक ने भगवती से याचना की कि बीमार होने के कारण अब मैं पूजा अर्चना करने नहीं आ पाऊंगा। इसलिए हे माता आप ही इसका कोई उपाय कीजिए।

साधक को माता ने दिया था स्वप्न

यह कह कर उक्त साधक मंदिर के मुख्यद्वार के समीप बीमार हाल में सो गया। जिसके बाद भगवती ने उक्त साधक को सुप्तावस्था में स्वप्न दिया कि तुम मेरी प्रतिमा को यहां से साथ लेकर चलो। जिसके बाद साधक ने भगवती की प्रतिमा लेकर हावीडीह गांव आ गए। गांव में प्रतिमा स्थापित की गई। आज भी वहां भगवती मंदिर है। इधर नवादा गांव के ग्रामीणों को जब पता चला कि मां भगवती की प्रतिमा को मंदिर से हावीडीहगांव के एक साधक अपने गांव लेकर चले गए, तो वहां के ग्रामीणों ने हावीडीहगांव से प्रतिमा को वापस लाने का फैसला कर लिया ।लेकिन मां भगवती ने मंदिर के पुजारी को स्वप्न दिया कि ग्रामीण हमारे सिंहासन की ही पूजा करें। उसी में ही गांव का कल्याण होगा और मनोकामना पूर्ण होगी ।जिसके बाद ग्रामीणों ने उसी दिन से मां भगवती के सिंहासन की पूजा अर्चना करने लगे जो अनवरत जारी है।

श्रद्धालुओं को मिलता है मनोवांछित फल

मंदिर के पुजारी का कहने है कि जो लोग सच्चे मन से मां भगवती की पूजा अर्चना करते हैं, उनको मनोवांछित फल मिलते हैं। मां जगदम्बा धाम नवादा पहुंचने का मार्ग मां जगदम्बा धाम नवादा आने के लिए सड़क मार्ग से भी आ सकते हैं। जिसके लिये मझौड़ा चौक से बहेड़ा-झंझारपुर पथ से पहुंच सकते हैं। वैसे मां जगदम्बा के नाम पर एक श्रमदान से हाल्ट निर्माण तो करवाया है। लेकिन वर्तमान में अभी वहां गाड़ी का ठहराव नहीं हो रहा है। अगर उक्त हाल्ट पर गाड़ी ठहराव विभाग द्वारा शुरू कर दिया जाता है। तो श्रद्धालुओं को जगदम्बा धाम जाने के लिए सबसे सुगम साधन होगा और श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ सकता है।

Friday, May 29, 2020

उच्चैठ भगवती मंदिर,मधुबनी




बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी गांव में मां काली का सिद्घपीठ, उच्चैठ भगवती का मंदिर अवस्थित है। इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है, यहीं महान कवि कालिदास को माता काली ने वरदान दिया था और मूर्ख कालिदास मां का आशीर्वाद पाकर ही महान कवि के रूप में विख्यात हुए।
इस सिद्घपीठ पर काले शिलाखंड पर देवी की मूर्ति बनी हुई है। यहां मां सिंह पर कमल के आसन पर विराजमान हैं। माता का सिर्फ कंधे तक का हिस्सा ही नज़र आता है। सिर नहीं होने के कारण इन्हें छिन्नमस्तिका दुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। माता के मंदिर के पास ही एक श्मशान है जहां आज भी तंत्र साधना की जाती है।
   
माना जाता है की यहाँ छिन्न मस्तिका माँ दुर्गा स्वयं प्रदुर्भावित हैं और यहाँ जो भी आता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। लोक मान्यता है कि उच्चैठ भगवती से जो भी भक्त श्रद्घा पूर्वक मांगा जाता है मां उसे अवश्य पूरा करती हैं। इसलिए इन्हें दुर्गा के नवम रूप सिद्घिदात्री और कामना पूर्ति दुर्गा के रूप में भी लोग पूजते हैं। भगवान श्री राम भी जनकपुर की यात्रा के समय उच्चैठ पहुंचे थे।
कैसे मूर्ख कालिदास बने विद्वान कालिदास : प्राचीन मान्यता है कि इसके पूर्व दिशा में एक संस्कृत पाठशाला थी और मंदिर तथा पाठशाला के बीच एक विशाल नदी थी। महामूर्ख कालिदास अपनी विदुषी पत्नी विद्दोतमा से तिरस्कृत होकर माँ भगवती के शरण में उच्चैठ आ गए थे और उस विद्यालय के आवासीय छात्रों के लिए खाना बनाने का कार्य करने लगे।
एक बार भयंकर बाढ़ आई और नदी का बहाव इतना ज्यादा था की मंदिर में संध्या दीप जलाने का कार्य जो कि छात्र किया करते थे , वो सब जाने में असमर्थ हो गए , कालिदास को महामूर्ख जान उसे आदेश दिया गया कि आज शाम वो दीप जला कर आये और साथ ही मंदिर की कोई निशानी लगा कर आये ताकि ये तथ्य हो सके कि वो मंदिर में पंहुचा था।
इतना सुनना था कि कालिदास झट से नदी में कूद पड़े और किसी तरह तैरते-डूबते मंदिर पहुंच कर दीपक जलाया और पूजा अर्चना की। अब मंदिर का कुछ निशान लगाने की बारी थी ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि उन्होंने दीप जलाया। कालिदास को कुछ नहीं दिखा तो उन्होंने जले दीप के कालिख को ही हाथ पर लगा लिया।
अब निशान बनाने के लिए उन्हें कुछ दिखा नहीं तो मूर्ख कालिदास ने माँ भगवती के साफ मुखमंडल पर ही कालिख लगा दिया, तभी माता प्रकट हुई और बोली रे मूर्ख कालिदास तुम्हे इतने बड़े मंदिर में कोई और जगह नहीं मिली और इस बाढ़ और घनघोर बारिश में जीवन जोखिम में डाल कर तुम दीप जलाने आ गए हो।
ये मूर्खता हो या भक्ति लेकिन मैं तुम्हे एक वरदान देना चाहती हूँ। कालिदास ने अपनी आपबीती सुनाई कि कैसे उनकी मूर्खता के कारण पत्नी ने तिरस्कृत कर भगा दिया। इतना सुनकर देवी ने वरदान किया कि आज सारी रात तुम जो भी पुस्तक स्पर्श करोगे तुम्हे कंठस्थ हो जाएगा।
   
कालिदास लौटे और सारे विद्यार्थियों के किताबों को स्पर्श कर डाला और आगे चलकर एक विद्वान कवि बने और अभिज्ञान शाकुंतलम , कुमार संभव , मेघदूत आदि की रचना की। आज भी वो नदी , उस पाठशाला के अवशेष मंदिर के निकट मौजूद है। मंदिर प्रांगण में कालिदास के जीवन सम्बंधित चित्र चित्रांकित हैं।

उच्चैठ देवी स्थान कैसे पहुचें : 
उच्चैठ देवी स्थान बेनीपट्टी से ४ किलोमीटर पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन है मधुबनी। सड़क द्वारा ये चारो दिशाओं से जुड़ा हुई है। अगर अपनी गाड़ी न हो तो बस के द्वारा भी यहां जाया जा सकता है। यह सिद्धपीठ सड़क मार्ग द्वारा दरभंगा, सीतामढ़ी और मधुबनी से जुड़ा हुआ है। इन स्थानों से बस और टैक्सी से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।
उच्चैठ भगवती में सालों भर भक्तों का आना जाना लगा रहता है लेकिन नवरात्र के मौके पर यहां भारी संख्या में लोग माता के दर्शनों के लिए आते हैं। इस अवसर पर बलि प्रदान और विशेष पूजा-पाठ का आयोजन होता है।

Kapileshwar Temple, Rahika(Madhubani)

  कपिलेश्वर मंदिर का इतिहास 


इस मंदिर से जुडी एक बहुत पुराणी कहानी है जो बहुत से लोगों को मालूम भी नहीं होगी। हजारो साल पहले यहापर एक ऋषि रहा करते थे। वो ऋषि भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। उस ऋषि का नाम कर्दम ऋषि था। वह ऋषि भगवान शिव की कड़ी तपस्या करते थे और ध्यान किया करते थे लेकिन उसके लिया उन्हें जल नहीं मिल रहा था। तभी वहापर चमत्कार हुआ, वरुण देव प्रकट हुए और उन्होंने ख़ुद एक तालाब निर्माण किया। वो तालाब आज भी वहा मौजूद है।
श्रावण के महीने में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने के लिए पुरे बिहार से लोग यहापर इकट्टा होते है। मंदिर के आजूबाजू का इलाका बहुत ही बड़ा है और परिसर के बीचोबीच भगवान शिव का मंदिर है और उसके आजूबाजु में पार्वती मंदिर और हनुमान मंदिर और आदि देवो के मंदिर है।
इस मंदिर के पवित्र गर्भगृह में भगवान शिव का मधु के रंग का लिंग स्थित है। यह लिंग काले पत्थर पर स्थित है और यह दिखने में अष्टकोनी है। सबसे पहले यह मंदिर भी अष्टकोनी हुआ करता था। लेकिन 1943 में आये भूचाल से मंदिर को बड़ी क्षति पहुची जिसके कारण मंदिर को अपना अष्टकोनी रूप खोना पड़ा। बाद में फिर दर्बंगा महाराजा ने इस मंदिर की मरम्मत करके अच्छा बनाया।
भगवान शिव मंदिर के उत्तर पश्चिमी दिशा में बटुक भैरव का भी एक छोटासा मंदिर है। मंदिर के उत्तर पश्चिमी दिशा में करीब 300 फीट की दुरी पर एक तालाब भी है। ऐसा कहा जाता है की जब ऋषि कर्दम ध्यान करते थे तो वो इस तालाब के पानी का इस्तेमाल किया करते थे। तब यह तलब बहुत ही छोटा था और इसे ख़ुद वरुण देव ने बनाया था।
यहापर देवी पार्वती के दो मंदिरे है। पश्चिम दिशा में स्थित इस पार्वती मंदिर का निर्माण भी दर्बंगा महाराज ने 1937 में करवाया था। पार्वती देवी का मंदिर भगवान शिव के मंदिर से लगभग 100 फीट की दुरी पर है। देवी पार्वती की मूर्ति की उचाई 2।5 फीट है।
पवित्र गर्भगृह के पश्चिम दिशा में भगवान विष्णु का एक छोटा सा मंदिर है जिसमे भगवान गणेश, विष्णु, नंदी और ब्रह्मदेव की छोटी छोटी मुर्तिया भी दिखाई देती है। वहा पर एक काला पत्थर भी है जिस पर भगवान विष्णु के चरण की प्रतिमा भी दिखाई देती है।
                       कपिलेश्वर मंदिर की यात्रा और उत्सव






महाशिवरात्रि के दिन यहापर भगवान शिव की बड़ी धूमधाम से बारात निकाली जाती है। हिन्दू धर्म अनुसार माघ महीने के कृष्ण पक्ष में यानि महाशिवरात्रि के दिन यहापर सभी लोग उपवास रखते है।
श्रावण के महीने में यहापर बड़ा मेला लगता है और सभी श्रद्धालु लोग गंगा के जल से शिवलिंग पर जलाभिषेक भी करते है।
विशेष भोग
भगवान शिव को सबसे पहले मख्खन के चावल, फल, शक्खर और मीठे चीजों का भोग लगाया जाता है। यहाँपर एक और परंपरा भी है की हिन्दू धर्म के अनुसार पूर्णिमा और संक्रांति के अवसर पर हर महीने में दो बार भगवान शिव को 56 भोग लगाने की परंपरा है।
मकर संक्रांति के दिन तो यहापर भगवान शिव को खिचड़ी भोग (इस डिश को चावल और दाल से बनाया जाता है) लगाया जाता है।
महत्त्व

ऐसा कहा जाता है इस मंदिर के तालाब में नहाने से इन्सान के सारे पाप धुल जाते है और वो पवित्र बन जाता है। जिन लोगों को बच्चे नहीं होते उन्हें यहापर भगवान के दर्शन करने पर संतान की प्राप्ति होती है।

Thursday, May 28, 2020

Ekadasha Rudra (Mangrauni), MADHUBANI, BIHAR

 Not more than five kilometre distance from Madhubani town, there is a historical and epical place known as Mangrauni. In ancient time, the name of Mangrauni was “Mangalwani” that means “The place of blessings” or “The place of worshippers”. Though there are so many temples in Mangrauni but the “Ekadasha Rudra” is mesmerising one and probably only one temple of its type in India. In “Ekadasha Rudra” temple, the eleven shiv lings is having the eleven forms of Shiva – Mahadev, Shiva, Rudra, Shankar, Neel, Lohit, Ishaan, Vijay, Bheem, Bhavodev and Kapali. The specialty of these shiv lings is that the work related to his different forms are made or symbolised on the respective shiv lings. This unique temple was construct by the famous enchanter Late Pundit Muneeshwar Jha in 1946. It is made up of black granite which was imported from Jaipur. Behind the “Ekadash Rudra” shiv lings, there is an idol of Lord Shiva and Parvati in “Pleasure Posture” or “Anand Mudra”.According to the Tantric view, in that posture Shiva is teaching Tantra to goddess Parvati but the epical meaning is completely different. Besides this idol,there are idols of Mahakali, Mahalakshmi, Mahasaraswati and the footsteps of lord Vishnu. On the right side, there is a temple named “Radhe-Shyam” temple in which you can see the ten different forms of Lord Vishnu or his “Avatars” which is also made of granite and Astadhatu. Near this temple, there is a pond called “Kastaharni Sarovar” means the pond which takes your grief or problems. The place is very cool and the way to Mangrauni is now better than previous road. So my suggestion is if you are not agnostic you must visit the “Ekadasha Rudra”.